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Home >> Core Resources >> Consumer Judgments LATEST CONSUMER JUDGMENTS मानव अधिकार लेख वस्तुतः मानव अधिकारों का स्वरूप सामाजिक ही है समाज के बिना अधिकारों का अस्तित्व सम्भव नहीं, यह एक प्रकार का सामाजिक दावा है जो कि न तो स्वार्थ पूर्ण है और न तो किसी दुसरे व्यक्ति के हितों को नुकसान पहुंचता है । प्रो० लास्की ने कहा है कि " अधिकार सामाजिक जीवन की वह परिस्थिति है जिनके बिना कोई भी मनुष्य अपनी उन्नति पर नहीं पहुंच सकता" मानव अधिकार द्वारा समाज में सभी के हितों की पुष्टि होती है और इसमे समाज तथा कानून की मान्यता निहित रहती है मानव अधिकारों का स्वरूप कल्याणकारी है ए प्रत्यक्ष तथा परोक्ष रूप से मानव कल्याण से संवंधित है मानव हित से संवंधित होने के कारण ही मानव अधिकार राज्य तथा समाज द्वारा स्वीकार किया जाता है ।मानव अधिकारों की सोच व्यक्ति के सामाजिक जीवन की देन है, समाज में रह कर ही मानव अधिकारों का प्रयोग किया जाता है मानव अधिकारों का प्रयोग जब-तक लोकहित में होता रहेगा तब-तक उसके ऊपर किसी का भी नियंत्रण नही हो सकेगा मानव अधिकारों के संरक्षण की जिम्मेदारी राज्य के ऊपर होती है, प्रत्येक व्यक्ति को समान रूप से अधिकारों का प्रयोग करने का अवसर देना कल्याणकारी राज्य का मुख्य उद्देश्य होना चाहिए, मानव अधिकारों का लक्ष्य सार्वभौमिक है यदि एक व्यक्ति को जीने का अधिकार है तो यह अधिकार सभी व्यक्तियों के लिए अन्तर्निहित है, मानव अधिकारों की अवधारणा ने कर्तव्य को प्राथमिकता दी है अधिकार हमेसा कर्तव्य से संवंधित रहता है कर्तव्य के अभाव में हम किसी अधिकार की कल्पना नहीं कर सकते यदि लोगों को संपत्ति का अधिकार है तो यह अन्य व्यक्ति का कर्तव्य है कि वे उसके इस अधिकार का उल्लंधन न करे इस विषय में पश्चिमी विचारक हाब हाउस ने कहा है कि "अधिकार और कर्तव्य सामाजिक कल्याण की दो महत्वपूर्ण दशाए है ।वैसे तो केवल एक लेख में संपूर्ण मानव अधिकारों की व्याख्या करना अत्यन्त कठिन कार्य है, सभ्यता और सामाजिक संगठन के साथ ही अधिकारों की वृद्धि होती गई और अब उनकी संख्या बहुत बढ़ गई है । भिन्न-भिन्न देशों के नागरिकों को भिन्न-भिन्न अधिकार प्राप्त है स्वतंत्र देश के नागरिक के अधिकार परतंत्र देश के नागरिकों के अधिकारों से भिन्न एवं मुखर होते है, हम यहाँ स्वतंत्र देश के नागरिकों के अधिकारों का अध्यन करें । अधिकारों को हम यहाँ चार श्रेणियों में विभाजित करते है । (१) प्राकृतिक अधिकार (२) नैतिक अधिकार (३) मौलिक अधिकार (४) कानूनी या वैधानिक अधिकार ।प्राकृतिक अधिकार :- प्राकृतिक अधिकारों की श्रेणी में नैतिक व नैसर्गिक मूल अधिकार आते है यदि प्राकृतिक शब्द का विश्लेषण किया जाय तो पता चलता है कि इस शब्द का प्रयोग विराट, स्वाभाविक, आदर्श, अकृत्रिम और नैतिक के अर्थ में होता है अतः प्राकृतिक अथवा नैसर्गिक अधिकारों से व्यक्ति के उन अधिकारों का ज्ञान होता है जो उसे प्राकृतिक अवस्था में प्राप्त हो इसका अर्थ यह हुआ कि आदिम अवस्था में अथवा समाज के निर्माण से पहले व्यक्ति उन अधिकारों का उपयोग करता आया है । इन अधिकारों की जननी प्रकृति थी और जबतक संसार में मनुष्य रहेंगे तब-तक उन अधिकारों से मनुष्य को वंचित नहीं किया जा सकता प्रकृति ने जो सामाजिक भावना की उत्पत्ति की है इन्ही अधिकारों की रक्षा के लिए थी ।उदाहरण के लिए-जीवन रक्षा और स्वतंत्रता के अधिकार व्यक्ति को है तो समाज का कर्तव्य हो जाता है कि वह इन अधिकारों की रक्षा इस लिए करे क्योकि समाज का निर्माण इन्ही अधिकारों की रक्षा के लिए हुआ है इस विषय में रूसों का मत है कि-"प्राकृतिक अधिकार ही आदर्श अधिकार थे और वे राज्य की उत्पत्ति से पहले विद्यमान थे ।नैतिक अधिकार :- ऐतिहासिक काल से ही समाज व्यक्ति के इन अधिकारों को स्वीकार करता आया है उदहारण के लिए-बच्चे को यह अधिकार प्राप्त है कि जब-तक वह बडा न हो जाय माता-पिता उसका भरण-पोषण करें, गरीबों को सहायता करना, अंधे को रास्ता बताना आदि ऐसे अधिकार है जिनके विपरीत कार्य करने पर राज्य अथवा समाज दण्डित तो नही कर सकता परन्तु उन्हें हीन दृष्टि से अवश्य देख सकता है । इस आधार पर नैतिक अधिकार को इस तरह परिभाषित किया जा सकता है "जिन अधिकारों के प्रयोग के अभाव में व्यक्ति के आत्मा को कष्ट हो अथवा जिसका संवंध आत्मा से है वे नैतिक अधिकार है जैसे राज्य या समाज का यह कर्तव्य है कि वह नारी (महिलाओं ) का आदर करे । शवों का सम्मान भी नैतिक अधिकार के ही अंतर्गत आते है ।मौलिक अधिकार :- इन अधिकारों को हम प्राकृतिक तथा वैज्ञानिक दोनों कह सकते है, यही कारण है जिसके उन्हें मूल अधिकार कहा जाता है । इन्ही अधिकारों के कारण व्यक्ति और समाज, राज्य और नागरिक का संवंध स्थिर होता है । कोई भी राज्य अथवा समाज बिना अपने सांस्कृतिक स्वरूप को बदले इन अधिकारों के प्रयोग से नागरिकों को वंचित नहीं कर सकता यही कारण है कि प्रायः सभी सभ्य एवं आधुनिक देशों के विधान में इन अधिकारों का स्पष्ट वर्णन रखा गया है । स्वतंत्रता, समानता, जीवनरक्षा, जीविकोपार्जन तथा देश के संविधान में आस्था इन्ही मौलिक अधिकारों की श्रेणी में आते है ।इन अधिकारों को प्राकृतिक अथवा मौलिक अधिकार इसलिए कहा जाता है कि इन्ही से व्यक्ति की स्थिति और विकास की आवश्यक दशाओं का निर्माण होता है इन अधिकारों का कोई निश्चित वैज्ञानिक विश्लेषण नहीं किया जा सकता तथा न ही इसकी कोई सर्वमान्य तालिका ही बनाई जा सकती है ।कानूनी या वैज्ञानिक अधिकार :- वैज्ञानिक अधिकारों के अंतर्गत सामाजिक तथा राजनैतिक दोनों प्रकार के अधिकार आते है । यह अधिकार व्यक्ति की वह मांग है जिसे समाज स्वीकार करता है तथा राज्य मान्यता देता है । वैज्ञानिक अधिकार वह अधिकार है जिसका उपयोग सभी नागरिक (वयस्क, बालक, विदेशी और व्यापारी ) करते है राज्य का यह कर्तव्य है कि इन अधिकारों के उपयोग के लिए सरल नियम बनाये साथ ही जो व्यक्ति, व्यक्ति अथवा समाज को इन अधिकारों के उपयोग से वंचित करें या इन अधिकारों का हनन अथवा अतिक्रमण करे उन्हें राज्य समुचित दंड दे । कानूनी अधिकारों को दो वर्गों में विभाजित किया जा सकता है (१) सामाजिक अधिकार (२) राजनैतिक अधिकार आगे जारीहम एक ऐसे समाज में रहते है जिसमे एक ही तरह की यौनिकता को मान्यता दी जाती है --शादी के रिश्ते में बंधे हुए औरत और मर्द की । एक मात्र उसी को 'प्राकृतिक' और 'सामान्य' बताया जाता है । इसमे भी मर्द की यौनिकता निर्णायक और प्रधान है । औरत की यौनिकता तो वंश चलाने का एक जरिया भर है । यहाँ तक की औरत और मर्द का क्या मतलब है, दोनों के बीच क्या रिश्ता हो, उनकी भूमिकाएं क्या हों और इनके मुताबिक परिवार का स्वरूप क्या हो--इन सबका सामाजिक ताकतें ऐसा रूप तय करती है जिससे की समाज में गैरबराबरी बनी रहे । इन सामाजिक ताकतों में महत्वपूर्ण है पित्रसत्ता, जिसे बरकरार रखने के लिए विषमलैंगिकता ( यौनिकता का वो रूप जिसमे केवल औरत और मर्द के बीच आकर्षण हो ) और जेंडर की एक संकीर्ण परिभाषा की जरुरत होती है । अगर औरत में औरतों से अपेक्षित गुण न हों, मर्द में मर्दों से जुड़े गुण न हों, और ये शादी में बंध कर अपनी तय भूमिकाएं निभाते हुए परिवार न बनाएँ, तो पित्रसत्ता की व्यवस्था चलेगी कैसे ? वे सभी जो इस 'आदर्श संरचना' के बाहर जीने की हिम्मत रखते है, उन्हें नैतिकता और समाज के लिए खतरा मन जाता है । इस खतरे के कारण सामाजिक व्यवस्था या तो इस 'आदर्श संरचना' से अलग जाने वालों के अस्तित्व को पुरी तरह नकार देती है या उन्हें यह कह कर अस्वीकार कर देती है कि वे पश्चिमी सभ्यता की उपज है । जैसे कहा जाता है कि 'हमारे समाज में लेस्बियन औरतें है ही नही' या 'पश्चिमी रंग में रंगे हुए उच्च वर्ग के मुठ्ठी भर शहरी युवक ही गे है । ' जब उनकी उपस्थिति को अनदेखा करना मुश्किल हो जाता है, तो उन्हें इस तरह दण्डित किया जाता है कि उनके लिए स्वतंत्र व गरिमामय जीवन जीना दूभर हो जाता है ।पिछले कुछ दशकों में समलैगिक इच्छा रखने वाले लोगों, जिसमें लेस्बियन ( औरत जो औरत के प्रति आकर्षित है ), गे ( मर्द जो मर्द के प्रति आकर्षित है ), बाईसेक्स्युअल ( औरत और मर्द दोनों के प्रति आकर्षित है ), ट्रांसजेंडरर्ड ( औरत और मर्द कि परिभाषा में नहीं बंधे हुए ), हिजडा आदि सामिल है, की ओर से हिंसामुक्त और भयमुक्त, गरिमामय जीवन के संवैधानिक मानव अधिकार की मांग भारत के अलग-अलग कोनों से उठ रही है । यह आन्दोलन ऐसे लोगों के विरुद्ध हो रहे मानव अधिकारों के हनन का विरोध कर रहा है । उनके संघर्षों के इतिहास का दस्तावेजीकरण कर रहा है । लोगों की आपबीती के माध्यम से टकराहट और सहयोग दोनों के अनुभवो को सामने ला रहा है । अन्य प्रगतिशील आन्दोलनों के साथ जुडाव बनाने की कोशिश भी जारी है । ताकि संगठित होकर उन सामाजिक ताकतों को चुनौती दी जा सके जो परिभाषित 'आदर्श संरचना' से बाहर रहने वालों को प्रताडित करती है।इस आलेख का विषय भारतीय दंड संहिता की धारा ३७७ है जो 'प्राकृतिक नियम के विरुद्ध' माने जाने वाले स्वैच्छिक यौन संबंधों को आपराधिक मानती है । और आज यौनिक अधिकारों के आन्दोलन में एक मुख्य बाधा बनी हुई है । बिडम्बना यह है की दावा किया जाता है कि १८६० में पास हुआ औपनिवेशिक कानून आज भी हमारे समाज के लिए उपयुक्त है । यह कानून ऐसे सभी यौनिक व्यवहारों को आपराधिक करार करने के लिए बनाया गया था जो प्रजनन प्रक्रिया से जुड़े नही है । इस कानून के अंतर्गत, दो वयस्कों के बीच समलैगिक यौनिक गतिविधियाँ या एक विषमलैंगिक शादीशुदा जोड़े के बीच मुख मैथुन से लेकर सभी 'अप्राकृतिक क्रियाएँ' अपराध है । फिर भी हमारे समाज में व्याप्त होमोफोबिया ( समलैगिकता के प्रति भय ) यह सुनिश्चित करता है कि केवल पहली स्थिति ( दो वयस्कों के बीच समलैंगिक व्यवहार) को ही दण्डित किया जाए ।धारा ३७७ के बारे में हमारी मुख्य चिंताएँ क्या है ? यौनिक और जेंडर की विविधता पर धारा ३७७ एकरूपता थोपना चाहती है । क्या 'प्राकृतिक' है और क्या 'सामान्य है --इन अवधारणाओं को यह मान्यता देती है ताकि पित्रसत्ता और विषमलैगिकता से जुड़ी शादी एवं परिवार जैसी सामाजिक संस्थाएं और उनमे निहित गैर- बराबरी बनी रहे । यह समलैगिक इच्छा रखने वाले लोगों को दण्डित करने की अनुमति देती है । इनके मानव अधिकारों का उल्लंघन राज्य व पुलिस, परिवार, मिडिया और चिकित्सा जैसे विविध राजकीय एवं गैर राजकीय पात्रों द्वारा बार-बार होता है । पुलिस द्वारा यौनिक अत्याचार और शोषण, जबरदस्ती पैसे ऐठ्ना, मानसिक चिकित्सा संस्थाओं में विजली के झटके और तेज दवाये देकर 'मरीज' की यौनिकता को बदलने की कोशिश करना और हर रोज होने वाले सामाजिक लांछन और भेदभाव-- ऐसे मानव अधिकार उल्लंघनों का दस्तावेजीकरण कई तथ्य-जांच की रिपोर्ट और अध्ययन करते है । लेकिन बार-बार घटने वाले इन गंभीर उल्लंघनों को समाज ने अभी तक नही समझा है । व्यक्तिगत जिंदगी के अनुभव भी हमे बताते है कि यह कानून मित्रों, परिवार वालों, सहकर्मियों आदि द्वारा खुले रूप से भिन्न यौनिक प्रवित्तियों को स्वीकार करने में एक मुख्य बाधा है । जो सामाजिक कार्यकर्ता इन उपेक्षित लोगों के बीच, शिक्षा सहयोग और पैरवी करने के लिए प्रतिबद्ध है । उन्हें भी कानूनी रूप से अपराधी ठहराए जाने का खतरा है ।इसके अलावा धारा ३७७ और बाल यौन उत्पीडन के मामले में इसके उपयोग ने बाल अधिकार कार्यकर्ताओं को हताश किया है । उनका तर्क यह है कि धारा ३७७ बाल यौन उत्पीडन से निपटने के लिए नही बनाया गया था । इसलिए वह बाल यौन उत्पीडन के मामलों की जटिलता और जरूरतों को समझने में पूरी तरह असमर्थ है । डर यह है कि जबतक धारा ३७७ बनी रहेगी, बाल यौन उत्पीडन पर अलग से कोई विशेष उपयुक्त कानून नही बन पाएगा ।धारा ३७७ के विरुद्ध सबसे पहली याचिका सन १९९४ में एड्स भेदभाव विरोधी आन्दोलन (ए.बी.वी.ए. ) द्वारा दायर की गई थी । सन २००१ में नांज फाउन्डेशन इंडिया ने लायर्स कलेक्टिव के माध्यम से दिल्ली उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका (पी.आई.एल.) दायर की सन २००३ में सरकार ने न्यायालय को जो जवाब दिया, उससे जाहिर है कि धारा ३७७ को चुनौती देना आसान नही होगा । सरकार का तर्क था कि आम तौर पर भारतीय समाज समलैगिकता को अनुचित मानता है । और इसे अपराध करार देना के लिए यही कारण काफी है । इसके अलावा बाल यौन उत्पीडन के मामलों में कानूनी कार्यवाही करने के लिए और समाज को नैतिक गिरावट से बचाने के लिए सरकार धारा ३७७ को सही करार देती है ।सितम्बर २००४ में दिल्ली उच्च न्यायालय ने याचिका रद्द की , यह कहते हुए कि याचिका उस समुदाय द्वारा दर्ज कीजा सकती है, जो इस् कानून से सीधे रूप से प्रभावित है । नाज ने इस फैसले पर पुनः विचार के लिए उच्च न्यायालय में एक रिव्यू पेटिशन दर्ज किया । पेटिशन में नाज ने तर्क दिया कि नांज को धारा ३७७ से प्रभावित समुदाय की ओर से याचिका दर्ज करनी पडी क्योकि धारा ३७७ के रहते अपने पहचान के खुलासे और पुलिस उत्पीडन के डर की वजह से समलैंगिक समाज ख़ुद सीधे अदालत नहीं जा सकता । लेकिन उच्च न्यायालय ने रिव्यू पेटिशन खारिज कर दिया । कई समूहों की राय लेते हुए नाज ने सर्वोच्च न्यायालय से उच्च न्यायालय के याचिका खारिज करने के सीमित बिन्दु पर अपील की । मामले की सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि यह एक सार्वजनिक हित का मामला है और एक ऐसा मसला है जिसपर दुनिया भर में चर्चा चल रही है अदालत ने सरकार को निर्धारित समय के अन्दर इस बात पर जवाब देने के लिए कहा कि जनहित याचिका वैध है है या नहीं ।धारा ३७७ के मूलभूत संदर्भ में, यह देखना बाकी है कि सरकार सामाजिक मूल्यों के नाम पर अपने नजरिये को लागु करने का अधिकार हथियाएगी ? क्या वो इस अधिकार को समलैगिक इच्छा रखने वाले लोगों की आजादी, सम्मान और अधिकारों से ज्यादा महत्वपूर्ण ठहराएगी ?लेकिन सार्वजनिक नैतिकता का फौजदारी कानून से क्या रिश्ता है ? कौन तय करता है कि 'नैतिक' क्या है और 'प्राकृतिक' क्या है ? अकेले भारत में ही समलैगिक इच्छा रखने वाले लोग, विधवाऐ, आगे जारी मानव अधिकारों की सार्वभौम घोषणा को स्वीकृत और घोषित किया । इस ऐतिहासिक कार्य के बाद ही सभा ने सभी सदस्य देशों से पुनरावेदन किया कि वे इस घोषणा का प्रचार करें और देशों अथवा प्रदेशों की राजनैतिक स्थिति पर आधारित भेदभाव का विचार किए बिना, विशेषतः विद्यालयों और अन्य शिक्षा संस्थाओं में, इसके प्रचार, प्रदर्शन, पठन और व्याख्या का प्रबंध करें ।प्रस्तावना :चूंकि मानव परिवार के सभी सदस्यों के जन्मजात गौरव और समान तथा अविच्छिन्न अधिकार की स्वीकृति ही विश्व-शांति, न्याय और स्वतंत्रता की बुनियाद है,चूंकि मानव अधिकारों के प्रति उपेक्षा और घृणा के फलस्वरूप ही ऐसे बर्बर कार्य हुय जिनसे मनुष्य की आत्मा पर अत्याचार किया गया, चूंकि एक ऐसी विश्व-व्यवस्था की उस स्थापना को (जिसमें लोगों को भाषण और धर्म की आजादी तथा भय और अभव से मुक्ति मिलेगी) सर्वसाधारण के लिए सर्वोच्च आकांक्षा घोषित किया गया है,चूंकि अगर अन्याययुक्त शासन और जुल्म के विरुद्ध लोगों को विद्रोह करने के लिय - उसे ही अंतिम उपाय समझकर - मजबूर नहीं हो जाना है, तो कनून द्वारा नियम बनाकर मानव अधिकारों की रक्षा करना अनिवार्य है,चूंकि राष्ट्रों के बीच मैत्रीपूर्ण संबंधों को बढ़ाना जरूरी है,चूंकि संयुक्त राष्ट्रों के सदस्य देशों की जनताओं ने बुनियादी मानव अधिकारों में, मानव व्यक्तित्व के गौरव और योग्यता में और नर-नारियों के समान अधिकारों में अपने विश्वास को अधिकार-पत्र में दहुराया है और यह निश्चय किया है कि अधिक व्यापक स्वतंत्रता के अंतर्गत सामाजिक प्रगति एवं जीवन के बेहतर स्तर को ऊंचा किया जाएं,चूंकि सदस्य देशों ने यह प्रतिज्ञा की है कि वे संयुक्त राष्ट्रों के सहयोग से मानव अधिकारों और बुनियादी आजादियों के प्रति सार्वभौम सम्मान की वृद्धि करेंगे,चूंकि इस प्रतिज्ञा को पूरी तरह से निभाने के लिए इन अधिकारों और आजादियों का स्वरूप ठीक-ठीक समझना सबसे जरूरी है । इसलिए, अब, समान्य सभा घोषित करती है कि मानव अधिकारों की यह सार्वभौम घोषणा सभी देशों और सभी लोगों की समान सफलता है । इसका उद्देश्य यह है कि प्रत्येक व्यक्ति और समाज का प्रत्येक भाग इस घोषणा को लगातार दृष्टि में रखते हुए अध्यापन और शिक्षा के द्वारा यह प्रयत्न करेगा कि इन अधिकारों और आजादियों के प्रति सम्मान की भावना जाग्रत हो, और उत्तरोत्तर ऐसे राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय उपाय किए जाएं जिनसे सदस्य देशों की जनता तथा उनके द्वारा अधिकृत प्रदेशों की जनता इन अधिकारों की सार्वभौम और प्रभावोत्पादक स्वीकृति दे और उनका पालन कराएं ।अनुच्छेद 1सभी मनुष्यों को गौरव और अधिकारों के मामले में जन्मजात स्वतंत्रता और समानता प्राप्त है । उन्हें बुद्धि और अंतरात्मा की देन प्राप्त है और परस्पर उन्हें भाईचारे के भाव से बर्ताव करना चाहिए । अनुच्छेद 2सभी को इस घोषणा में सन्निहित सभी अधिकरों और आजादियों को प्राप्त करने का हक है और इस मामले में जाति, वर्ण, लिंग, भाषा, धर्म, राजनीतिक या अन्य विचार-प्रणाली, किसी देश या समाज विशेष में जन्म, संपत्ति या किसी प्रकार की अन्य मर्यादा आदि के कारण भेदभाव का विचार न किया जाएगा । इसके अतिरिक्त, चाहे कोई देश या प्रदेश स्वतंत्र हो, संरक्षित हो, या स्वशासन रहित हो, या परिमित प्रभुसत्ता वाला हो, उस देश या प्रदेश की राजनैतिक क्षेत्रीय या अंतर्राष्ट्रीय स्थिति के आधार पर वहां के निवासियों के प्रति कोई फ़रक न रखा जाएगा । अनुच्छेद 3प्रत्येक व्यक्ति को जीवन, स्वाधीनता और वैयक्तिक सुरक्षा का अधिकार है । अनुच्छेद 4कोई भी गुलामी या दासता की हालत में न रखा जाएगा, गुलामी-प्रथा और गुलामों का व्यापार अपने सभी रूपों में निषिद्ध होगा । अनुच्छेद 5किसी को भी शारीरिक यातना न गी जाएगी और न किसी के भी प्रति निर्दय, अमानुषिक या अपमानजनक व्यबहार होगा । अनुच्छेद 7कानून की निगाह में सभी समान हैं और सभी बिना भेदभाव के समान कानूनी सुरक्षा के अधिकारी हैं । यदि इस घोषणा का अतिक्रमण करके कोई भी भेदभाव किया जाए या उस प्रकार के भेदभाव को किसी प्रकार से उकसाया जाए, तो उसके विरुद्ध समान सुरक्षण का अधिकार सभी को प्राप्त है । अनुच्छेद 8सभी को संविधान या कानून द्वारा प्राप्त बुनियादी अधिकारों का अतिक्रमण करने वाले कार्यों के विरुद्ध समुचित राष्ट्रीय अदालतों की कारगर सहायता पाने का हक है । अनुच्छेद 9किसी को भी मनमाने ढंग से गिरफ्तार, नजरबंद, या देश-निष्कसित न किया जाएगा । अनुच्छेद 10 सभी को पूर्ण्तः समान रूप से हक है कि उनके अधिकारों और कर्तव्यों के निश्चय करने के मामले में और उन पर आरोपित फौजदारी के किसी मामले में उनकी सुनवाई न्यायोचित और सार्वजनिक रूप से निरपेक्ष एवं निष्पक्ष अदालत द्वारा हो । अनुच्छेद 111. प्रत्येक व्यक्ति, जिस पर दंडनीय अपरोध का आरोप किया गया हो, तब तक निरपराध माना जाएगा, जब तक उसे ऐसी खुली अदालत में, जहां उसे अपनी सफाई की सभी आवश्यक सुविधाएं प्राप्त हों , कानून के अनुसार अपराधी न सिद्ध कर दिया जाए । 2। कोई भी व्यक्ति किसी भी ऐसे कृत या अकृत (अपराध) के कारण उस दंडनीय अपराध का अपराधी न माना जाएगा, जिसे तत्कालीन प्रचलित राष्ट्रीय या अंतर्राष्ट्रीय कानून के अनुसार दंडनीय अपराध न माना जाए और न अससे अधिक भारी दंड दिया जा सकेगा, जो उस समय दिया जाता जिस समय वह दंडनीय अपराध किया गया था । अनुच्छेद 12किसी व्यक्ति की एकांतता, परिवार, घर, या पत्रव्यवहार के प्रति कोई मनमाना हस्तक्षेप न किया जाएगा, न किसी के सम्मान और ख्याति पर कोई आक्षेप हो सकेगा । ऐसे हस्तक्षेप या आक्षेपों के विरुद्ध प्रत्येक को कनूनी रक्षा का अधिकार प्राप्त है अनुच्छेद 131. प्रत्येक व्यक्ति को प्रत्येक देश की सीमाओं के अंदर स्वतंत्रतापूर्वक आने, जाने, और बसने का अधिकार है । 2। प्रत्येक व्यक्ति को अपने या पराए किसी भी देश को छोड़ने और अपने देश वापस आने का अधिकार है । अनुच्छेद 141. प्रत्येक व्यक्ति को स्ताए जाने पर दूसरे देशों में शरण लेने और रहने का अधिकार है । 2। इस अधिकार का लाभ ऐसे मामलों में नहीं मिलेगा जो वास्तव में गैर-राजनीतिक अपराधों से संबंधित हैं, या जो संयुक्त राष्ट्रों के उद्देश्यों और सिद्धांतों के विरुद्ध कार्य हैं । अनुच्छेद 151. प्रत्येक व्यक्ति को किसी भी राष्ट्र-विशेष को नागरिकता का अधिकार है । 2। किसी को भी मनमाने ढंग से अपने राष्ट्र की नागरिकता से वंचित न किया जाएगा या नागरिकता का परिवर्तन करने से मना न किया जाएगा । अनुच्छेद 161. बालिग स्त्री-पुरुषों को बिना किसी जाति, राष्ट्रीयता या दर्म की रुकावटों के आपस में विवाह करने और परिवार स्थापन करने का अधिकार है । उन्हें विवाह के विषय में वैवाहिक जीवन में, तथा विवाह विच्छेद के बारे में समान अधिकार है । 2. विवाह का इरादा रखने वाले स्त्री-पुरुषों की पूर्ण और स्वतंत्र सहमति पर ही विवाह हो सकेगा । 3। परिवार समाज का स्वाभाविक और बुनियादी सामूहिक इकाई है और उसे समाज तथा राज्य द्वारा संरक्षण पाने का अधिकार है ।अनुच्छेद 171। प्रत्येक व्यक्ति को अकेले और दूसरों के साथ मिलकर संपत्ति रखने का अधिकार है । 2. किसी को भी मनमाने ढंग से अपनी संपत्ति से वंचित न किया जाएगा । अनुच्छेद 18प्रत्येक व्यक्ति को विचार, अंतरात्मा और धर्म की आजादी का अधिकार है । इस अधिकार के अंतर्गत अपना धर्म या विश्वास बदलने और अकेले या दूसरों के साथ मिलकर तथा सार्वजनिक रूप में अथवा निजी तर पर अपने धर्म या विश्वास को शिक्षा, क्रिया, उपसाना, तथा व्यवहार के द्वारा प्रकट करने की स्वतंत्रता है । अनुच्छेद 19प्रत्येक व्यक्ति को विचार और उसकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार है । इसके अंतर्गत बिना हस्तक्षेप के कोई राय रखना और किसी भी माध्यम के जरिए से तथा सीमाओं की परवाह न करके किसी की सूचना और धारणा का अन्वेषण, ग्रहण तथा प्रदान सम्मिलित है । अनुच्छेद 201. प्रत्येक व्यक्ति को शांति पूर्ण सभा करने या समित्ति बनाने की स्वतंत्रता का अधिकार है । 2। किसी को भी किसी संस्था का सदस्य बनने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता । अनुच्छेद 211. प्रत्येक व्यक्ति को अपने देश के शासन में प्रत्यक्ष रूप से या स्वतंत्र रूप से चुने गए प्रतिनिधिओं के जरिए हिस्सा लेन का अधिकार है । 2. प्रत्येक व्यक्ति को अपने देश की सरकारी नौकरियों को प्राप्त करने का समान अधिकार है । ३। सरकार की सत्ता का आधार जनता की इच्छा होगी । इस इच्छा का प्रकटन समय-समय पर और असली चुनावों द्वारा होगा । ये चुनावों सार्वभौम और समान मताधिकार द्वारा होंगे और गुप्त मतदान द्वारा या किसी अन्य समान स्वतंत्र मतदान पद्धति से कराए जाएंगे । अनुच्छेद 22समाज के एक सदस्य के रूप में प्रत्येक व्यक्ति को सामाजिक सुरक्षा का अधिकार है और प्रत्येक व्यक्ति को अपने व्यक्तित्व के उस स्वतंत्र विकास तथा गौरव के लिए - जो राष्ट्रीय प्रयत्न या अंतर्राष्ट्रीय सहयोग तथा प्रत्येक राज्य के संगठन एवं साधनों के अनुकूल हो - अनिवार्यतः आवश्यक आर्थिक, सामाजिक, और सांस्कृतिक अधिकारों की प्राप्ति का हक है । अनुच्छेद 231. प्रत्येक व्यक्ति को काम करने, इच्छानुसार रोजगार के चुनाव, काम की उचित और सुविधाजनक परिस्थितियों को प्राप्त करने और बेकारी से संरक्षण पाने का हक है । 2. प्रत्येक व्यक्ति को समान कार्य के लिएअ बिना किसी भेदभव के समान मजदूरी पाने का अधिकार है । 3. प्रत्येक व्यक्ति को जो काम करता है, अधिकार है कि वह इतनी उचित और अनुकूल लजदूरी पाए, जिससे वह अपने लिए और अपने परिवार के लिए ऐसी आजीविका का प्रबंध कर सके, जो मानवीय गौरव के योग्य हो तथा आवश्यकता होने पर उसकी पूर्ति अन्य प्रकार के सामाजिक संरक्षणों द्वारा हो सके । 4। प्रत्येक व्यक्ति को अपने हितों की रक्षा के लिए श्रमजीवी संघ बनाने और उनमें भाग लेने का अधिकार है । अनुच्छेद 24प्रत्येक ब्यक्ति को विश्राम और अवकाश का अधिकार है । इसके अंतर्गत काम के घंटों की उचित हदबंदी और समय-समय पर मजदूरी सहित छुट्टियां सम्मिलित है । अनुच्छेद 251.प्रत्येक व्यक्ति को ऐसे जीवनस्तर को प्राप्त करने का अधिकार है जो उसे और उसके परिवार के स्वास्थ्य एवं कल्याण के लिए पर्याप्त हो । इसके अंतर्गत खाना, कपड़ा, मकान, चिकित्सा-संबंधी सुविधाएं और आवश्यक सामाजिक सेवाएं सम्मिलित है । सभी को बेकारी, बीमारी, असमर्था, वैधव्य, बुढ़ापे या अन्य किसी ऐसी परिस्थिति में आजीविका का साधन न होने पर जो उसके काबू के बाहर हो, सुरक्षा का अधिकार प्राप्त है । 2। जच्चा और बच्चा को खास सहायता और सुविधा का हक है । प्रत्येक बच्चे को चाहे वह विवाहिता माता से जन्मा हो या अविवाहिता से, समान सामाजिक संरक्षण प्राप्त है । अनुच्छेद 261. प्रत्येक व्यक्ति को शिक्षा का अधिकार है । शिक्षा कम से कम प्रारंभिक और बुनियादी अवस्थाओं में निःशुल्क होगी । प्रारंभिक शिक्षा अनिवार्य होगी । टेक्निकल, यांत्रिक और पेशों-संबंधी शिक्षा साधारण रूप से प्राप्त होगी और उच्चतर शिक्षा सभी को योग्यता के आधार पर समान रूप से उपलब्ध होगी । 2. शिक्षा का उद्देश्य होगा मानव व्यक्तित्व का पूर्ण विकास और मानव अधिकारों तथा बुनियादी स्वतंत्रताओं के प्रति सम्मान की पुष्टि । शिक्षा द्वारा राष्ट्रों, जातियों, अथवा धार्मिक समूहों के बीच आपसी सद्भावना, सहिष्णुता और मैत्री का विकास होगा और शांति बनाए रखने के लिए संयुक्त राष्ट्रों के प्रयत्नों को आगे बढ़ाया जाएगा । 3। माता-पिता को सबसे पहले इस बात का अधिकार है कि वह चुनाव कर सकें कि किस किस्म की शिक्षा उनके बच्चों को दी जाएगी । अनुच्छेद 271. प्रत्येक व्यक्ति को स्वतंत्रता-पूर्वक समाज के सांस्कृतिक जीवन में हिस्सा लेने, कलाओं का आनंद लेने, तथा वैज्ञानिक उन्नति और उसकी सुविशाओं में भाग लेने का हक है । 2। प्रत्येक व्यक्ति को किसी भी ऐसी वैज्ञानिक साहित्यिक या कलात्मक कृति से उत्पन्न नैतिक और आर्थिक हितों की रक्षा का अधिकार है जिसका रचयिता वह स्वयं है । अनुच्छेद 28प्रत्येक व्यक्ति को ऐसी सामाजिक और अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था की प्राप्ति का अधिकार है जिसमें उस घोष्णा में उल्लिखित अधिकारों और स्वतंत्रताओं का पूर्णतः प्राप्त किया जा सके । अनुच्छेद 291. प्रत्येक व्यक्ति का उसी समाज प्रति कर्तव्य है जिसमें रहकर उसके व्यक्तित्व का स्वतंत्र और पूर्ण विकास संभव हो । 2. अपने अधिकारों और स्वतंत्रताओं का उपयोग करते हुए प्रत्येक व्यक्ति केवल ऐसी ही सीमाओं द्वारा बंध होगा, जो कानून द्वारा निश्चित की जाएंगी और जिनका एकमात्र उद्देश्य दूसरों के अधिकारों और स्वतंत्रताओं के लिए आदर और समुचित स्वीकृति की प्राप्ति होगा तथा जिनकी आवश्यकता एक प्रजातंत्रात्मक समाज में नैतिकता, सार्वजनिक व्यवस्था और समान्य कल्याण की उचित आवश्यकताओं को पूरा करना होगा । 3। इन अधिकारों और स्वतंत्रताओं का उपयोग किसी प्रकार से भी संयुक्त राष्ट्रों के सिद्धांतों और उद्देश्यों के विरुद्ध नहीं किया जाएगा । अनुच्छेद 30इस घोष्णा में उल्लिखित किसी भी बात का यह अर्थ नहीं लगाना चाहिए जिससे य प्रतीत हो कि किसी भी राज्य, समूह या ब्यक्ति को किसी ऐसे प्रयत्न में संलग्न होने या ऐसा कार्य करने का अधिकार है, जिसका उद्देश्य यहां बताए गए अधिकारों और स्वतंत्रताओं में से किसी का भी विनाश करना हो । |
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